Saturday, 12 March 2011

महिलाएं और हो समाज 




हो समाज भगवान को सिञवोन्गा के रूप में मानता है। और यह सिञवोन्गा प्रकृति की असीम शक्ति को दर्शाता है। सिञवोन्गा 'हो'भाषा के तीन शब्दों के मिलन का एक नाम है सिञ + बू + ओंगाह। सिञ ऋणात्मक शक्ति है, ओंगाह धनात्मक शक्ति है और बू इनदोनों शक्तियों का कर्म स्थल है। इस तरह नर और नारी के मिलन के रूप में सिञवोन्गा 'हो' समाज में असीम शक्ति के रूप में पूज्यमान है। आदिवासी 'हो' समाज के दर्शन के अनुसार नर और नारी ही पूजा उपासना के केन्द्र विन्दु है। नर धनात्मक पक्ष का द्योतक है और नारी ऋणात्मक पक्ष का। इन दोनों का मिलन ही सिञवोन्गा की परिकल्पना को दर्शाता है। जिसे 'हो' समाज या समुदाय सिञवोन्गा के रूप में मानता है, उपासना करता है।


किसी भी समाज को उसमे उसकी महिलाऔ की  स्तिथि से आंकना चाहेयी। जहाँ तक " हो " समाज में महिलाऔ  की स्तिथि की बात है । काफी विरोधाभास है । महिलाऔ की जनसन्ख्या पुरूषों  से अधिक है ,ऐसा  बहुत ही कम देखने को मिलता है खासकर अन्य समाजो में ।  मगर जब हम शिक्चा को देखते हैं  तो जमीन आसमान का अंतर है । महिलाऔ में जहाँ सकचार्था  का प्रतिशत सिर्फ २२ है और पुरूषों में सिर्फ ३९ । हालाँकि दोनों ही औसत राश्ट्रीय सकचार्था  से काफी कम है , और सोच का विषय है । 

आशा है नयी जनगणना में जहाँ पहली स्तिथि बरक़रार रहेगी वहीँ दूसरी स्तिथि में सुधार  होगा । हो - समाज  में महिलाऔ का ऊंचा स्थान है , लड़किओं  के जनम को हमेशा स्वीकारा गया है । पत्नीयों  को सहायक का दर्जा प्राप्त है । दहेज़ प्रथा ने हमें दूषित नहीं किया है । ( इस सन्दर्भ में  "गोनोंग " का जिक्र  करना चाहूउगा  जो लड़कों  द्वारा दिया जाता है और कई बार इसे  लड़किओं के कीमत के रूप में बोला जाता है , जो सही नहीं है । " अगर आप गोनोंग दे सकते  हैं , तब आप जरूर मेरी  बेटी को सम्मान  के साथ और खुश रख  पाएंगे "  यही इसका मूल है । ये लड़कों  के सामर्थ्य को परखने  का तरीका हुआ करता था , जिसे हम आज भी मानते आ रहे  हैं । )

इन सबो  के बावजूद  कई स्तिथियां है जहाँ बदलावों  की  जरूरत है  
..महिलाऔ को संपत्ति  का अधिकार 
...महिलाऔ को पूजा के दौरान कुछ पूजा विधियौं  से वंचित रखना 
..... समाज के प्रित्तिसत्तात्मक होने के कारण कभी किसी महिला का मुंडा और मानकी न बनना  
........महिलाऔ को खेत में हल चलाना वर्जित होना    

और भी कई विषियों में बदलावों की  जरूरत है, जहाँ तक महिलाओं  की  ख़ुशी की  बात है वो तो इस  FB  में मौजूद महिलाओं को ही बताना होगा  और सवाल पूछने  के बजाये क्या की ये अच्छा  नहीं हो की आप आपना विचार रखें  और हम सबो को बताएं  जिससे , अगर  जाने- अनजाने  आप लोगों को उचित सम्मान ना दे रहे  हों  तो हम  खुद में बदलाव  ला सकें 



"  हर नयी पीढी  अपने - आप  में एक नया समाज होती है ,और वो खुद उस समाज के दस्तूरों को बना सकती है "