उन आखों का हसना भी क्या जिसमे आसूं ना हो
Saturday, 23 July 2011
Tuesday, 5 July 2011
जनआक्रोश रैली
दिनांक ४ जुलाई को चाईबासा में हर उम्र के लोगो ने बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया,और लोगो ने प्रशाशन को बता दिया की वो आपने आधिकारो और कर्तव्यों के प्रती जागृत हो चूका है .
मौका था चाईबासा से लगे हुए १३ विभिन्न राजस्व गाँव को नगरपालिका में शामिल करने के विरोध में जनआक्रोश रैली. हर उम्र और तबके के लोगों ने इसमे हिस्सा लिया.क्या बच्चे क्या बूढ़े, पुरे १३गावों के सभी ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ रैली में शामिल हुए. तक़रीबन 6 की.मी.की रैली थी. पूरा चाईबासा ठहर सा गया था.
रैली गाँधी मैंदान से शुरु हुई और विभिन्न रास्तो से होते हुए DC कार्यालय गयी और अपनी मागौं के प्रती ज्ञापन दिया.
प्रमुख मांगो के अलावा विलकिंसन रुल, सी.एन.टी.एक्ट १९०८, समता जजमेंट आदी पर भी सबो ने आपना मत रखा.
रैली को मानकी मुंडा संघ,आदिवासी हो समाज महासभा,आदिवासी हो समाज युवा महासभा, खुटपानी भूमी रक्षा समिती , कोल्हान पांचवी अनुसूची (अनुसूचित जनजाति रुदिजन्य विधि) अनुपालन समिति,कोल्हान रक्षा संघ आदी के बुद्धीजीवियों ने दिशा दी .
Saturday, 23 April 2011
सच कहा आपने......हम खुद भी इन मामलो को भूल से गए थे....
याद दिलाने के लिए शुक्रिया........
जो वहां रहते हैं उनके लिए जिन्दगी कितनी मुश्किल होगी ...
एक ओर माओवादी और दूसरी ओर सरकारी महकमे का कहर ....
आप जिसकी की थोड़ी मदद करेंगे ,दूसरा आपको दुश्मन समझेगा ...
और क्योँकी वो आपका घर है ,आप उस जगह को छोड़ भी नहीं सकते ......
एक ओर कुआँ और दुसरे ओर खाई ........ कोई उपाय ...
जिन्दगी से डर लगता है ,,,,,,,,,
मगर , जिन्दगी तो तुम भी हो .........
..................... जिन्दगी तो हम भी हैं .....................
तू रुसवा है तो लगता है ......मौत क्या हसीन होगी ?
तू जो साथ है तो, हर लम्हा जन्नत का सुकून देता है............
मगर न जाने क्यों ........
जिन्दगी से डर लगता है ...................
कभी किसी से वादा था मुस्कराने का.......................
........इसलिए हर गम पर मुस्कुराता हु ...........
मगर ए दोस्त ,,,,,,, मुस्कुराने की दुआ मत देना ...........
मुझे पल भर मुस्कारने की सज़ा मालूम है .......................
Friday, 22 April 2011
Wednesday, 20 April 2011
Saturday, 12 March 2011
महिलाएं और हो समाज
हो समाज भगवान को सिञवोन्गा के रूप में मानता है। और यह सिञवोन्गा प्रकृति की असीम शक्ति को दर्शाता है। सिञवोन्गा 'हो'भाषा के तीन शब्दों के मिलन का एक नाम है सिञ + बू + ओंगाह। सिञ ऋणात्मक शक्ति है, ओंगाह धनात्मक शक्ति है और बू इनदोनों शक्तियों का कर्म स्थल है। इस तरह नर और नारी के मिलन के रूप में सिञवोन्गा 'हो' समाज में असीम शक्ति के रूप में पूज्यमान है। आदिवासी 'हो' समाज के दर्शन के अनुसार नर और नारी ही पूजा उपासना के केन्द्र विन्दु है। नर धनात्मक पक्ष का द्योतक है और नारी ऋणात्मक पक्ष का। इन दोनों का मिलन ही सिञवोन्गा की परिकल्पना को दर्शाता है। जिसे 'हो' समाज या समुदाय सिञवोन्गा के रूप में मानता है, उपासना करता है।
किसी भी समाज को उसमे उसकी महिलाऔ की स्तिथि से आंकना चाहेयी। जहाँ तक " हो " समाज में महिलाऔ की स्तिथि की बात है । काफी विरोधाभास है । महिलाऔ की जनसन्ख्या पुरूषों से अधिक है ,ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है खासकर अन्य समाजो में । मगर जब हम शिक्चा को देखते हैं तो जमीन आसमान का अंतर है । महिलाऔ में जहाँ सकचार्था का प्रतिशत सिर्फ २२ है और पुरूषों में सिर्फ ३९ । हालाँकि दोनों ही औसत राश्ट्रीय सकचार्था से काफी कम है , और सोच का विषय है ।
आशा है नयी जनगणना में जहाँ पहली स्तिथि बरक़रार रहेगी वहीँ दूसरी स्तिथि में सुधार होगा । हो - समाज में महिलाऔ का ऊंचा स्थान है , लड़किओं के जनम को हमेशा स्वीकारा गया है । पत्नीयों को सहायक का दर्जा प्राप्त है । दहेज़ प्रथा ने हमें दूषित नहीं किया है । ( इस सन्दर्भ में "गोनोंग " का जिक्र करना चाहूउगा जो लड़कों द्वारा दिया जाता है और कई बार इसे लड़किओं के कीमत के रूप में बोला जाता है , जो सही नहीं है । " अगर आप गोनोंग दे सकते हैं , तब आप जरूर मेरी बेटी को सम्मान के साथ और खुश रख पाएंगे " यही इसका मूल है । ये लड़कों के सामर्थ्य को परखने का तरीका हुआ करता था , जिसे हम आज भी मानते आ रहे हैं । )
इन सबो के बावजूद कई स्तिथियां है जहाँ बदलावों की जरूरत है ।
..महिलाऔ को संपत्ति का अधिकार ।
...महिलाऔ को पूजा के दौरान कुछ पूजा विधियौं से वंचित रखना ।
..... समाज के प्रित्तिसत्तात्मक होने के कारण कभी किसी महिला का मुंडा और मानकी न बनना ।
........महिलाऔ को खेत में हल चलाना वर्जित होना ।
और भी कई विषियों में बदलावों की जरूरत है, जहाँ तक महिलाओं की ख़ुशी की बात है वो तो इस FB में मौजूद महिलाओं को ही बताना होगा और सवाल पूछने के बजाये क्या की ये अच्छा नहीं हो की आप आपना विचार रखें और हम सबो को बताएं जिससे , अगर जाने- अनजाने आप लोगों को उचित सम्मान ना दे रहे हों तो हम खुद में बदलाव ला सकें ।
" हर नयी पीढी अपने - आप में एक नया समाज होती है ,और वो खुद उस समाज के दस्तूरों को बना सकती है "
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